अयोध्या राम जन्म भूमि का पौराणिक इतिहास क्या है?

अयोध्या राम जन्म भूमि का पौराणिक इतिहास जो हमारी आस्था और गौरव से जुड़ा हुआ है। भारतीय प्राचीन साहित्य में उपस्थित प्रमाणों के अनुसार अयोध्या को भगवान श्रीराम के पूर्वज भगवान विवस्वान (सूर्य देव) के पुत्र वैवस्वत मनु ने बसाया था, तभी से इस नगर पर सभी सूर्यवंशी राजाओं का राज्य महाभारतकाल के अंत तक बना रहा था।

अयोध्या राम जन्म भूमि का पौराणिक इतिहास

इसी अयोध्या में प्रभु श्रीराम ने राजा दशरथ के महल में अवतार लिया था। महर्षि वाल्मीकि ने भी रामायण मे जो अयोध्या राम जन्म भूमि का पौराणिक ऐतिहासिक साक्ष्य भी है जिसमे उन्होंने अयोध्या की शोभा एवं उसकी महत्ता की तुलना इन्द्रलोक से है।

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धन और धान्य व अमूल्य रत्नों से भरी हुई अयोध्या नगरी की अतुलनीय व अनुपम छटा एवं गगनचुंबी इमारतों का अयोध्या नगरी में होने का सम्पूर्ण वर्णन भी वाल्मीकि रामायण में विस्तार से मिलता है।

 

अयोध्या राम जन्म भूमि का पौराणिक इतिहास क्या है? What is the mythological history of Ayodhya Ram Janmabhoomi in Hindi? 

अयोध्या राम जन्म भूमि का पौराणिक इतिहास जानने के लिए हमे समय में पीछे जाना होगा, भगवान श्रीराम के अपने परम धाम में जाने के पश्चात अयोध्या कुछ काल के लिए उजाड़-सी हो गई थी, लेकिन उनकी भूमि पर बना श्री राम का महल वैसे का वैसा ही था। 

भगवान श्रीराम के पुत्र कुश ने एक बार फिर पुन: अयोध्या का अपनी राजधानी के रूप में पुनर्निर्माण कराया। इस निर्माण के बाद सूर्यवंश की लगभग अगली 44 पीढ़ियों तक इसका अस्तित्व बना रहा जो आखिरी राजा, महाराजा बृहद्बल के समय तक अपने चरम पर था।

 

कौशलराज बृहद्बल की मृत्यु महाभारत युद्ध में अर्जुन पुत्र अभिमन्यु के हाथों से हुई थी। महाभारत के युद्ध के पश्चात अयोध्या नगरी पुनः उजाड़ सी हो गई, परन्तु अयोध्या राम जन्मभूमि का अस्तित्व फिर भी ज्यों का त्यों बना रहा।

अयोध्या राम जन्म भूमि का राजा विक्रमादित्य द्वारा पुनः निर्माण  

इसके बाद उपलबध साक्ष्यो से यह उल्लेख मिलता है कि ईसा के लगभग 100 वर्ष पूर्व उज्जैन के चक्रवर्ती सम्राट महाराजा विक्रमादित्य एक दिन आखेट करते-करते अयोध्या तक पहुंच गए। अत्यधिक थकान होने के कारण उन्होंने अयोध्या में सरयू नदी के किनारे एक आम के वृक्ष के नीचे अपनी सेना सहित आराम करने का निश्चय किया। 

उस समय तक यहां काफी घना जंगल हो चला था। किसी प्रकार की कोई बसावट भी यहां नहीं थी। महाराज विक्रमादित्य को इस भूमि में कुछ दिव्य अनुभूतियाँ होने लगी। तब उन्होंने इसकी खोज आरंभ की और आस-पास के कुछ योगी व संतों की कृपा से उन्हें यह ज्ञात हुआ कि यह अयोध्या श्रीराम जन्म भूमि है। 

तब उन संतों के निर्देश से सम्राट विक्रमादित्य ने यहां एक भव्य अयोध्या राम जन्म भूमि मंदिर के निर्माण के साथ ही कूप, सरोवर और महल आदि का निर्माण भी करवाया। कहते हैं कि उन्होंने अयोध्या राम जन्म भूमि पर काले रंग के कसौटी पत्थर वाले 84 स्तंभों पर एक विशाल श्री राम मंदिर का निर्माण करवाया था। इस मंदिर की भव्यता देखने वालो को भी चकित करती थी।

अयोध्या राम जन्म भूमि के पौराणिक इतिहास के साक्ष्य 

विक्रमादित्य के बाद के राजाओं ने भी समय-समय पर इस मंदिर की देख-रेख की। उन्हीं में से एक शुंग वंश के प्रथम शासक पुष्यमित्र शुंग ने भी अपने समय पर मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था। पुष्यमित्र का एक शिलालेख भी अयोध्या से प्राप्त हुआ था जिसमें उसका एक सेनापति के रूप में वर्णन किया गया है तथा उसके द्वारा दो अश्वमेध यज्ञों का अयोध्या में किए जाने का वर्णन भी मिलता है।

 

अयोध्या में हुई खुदाई में ऐसे अनेको अभिलेख प्राप्त हुऐ है जिनसे यह ज्ञात होता है कि गुप्तवंशीय सम्राट चन्द्रगुप्त द्वितीय के समय और उसके तत्पश्चात काफी समय तक अयोध्या ही गुप्त साम्राज्य की राजधानी थी। गुप्तकालीन समय के महाकवि कालिदास ने भी अयोध्या राम जन्म भूमि के पौराणिक इतिहास का अपने महाकाव्य रघुवंश में कई बार उल्लेख किया है।

अयोध्या राम जन्म भूमि का पौराणिक इतिहास

आधुनिक इतिहासकारों के अनुसार 600 ईसा पूर्व तक अयोध्या एक महत्वपूर्ण व्यापार का केंद्र था। इस स्थान को एक अंतरराष्ट्रीय पहचान 5वीं शताब्दी में ईसा पूर्व के दौरान तब मिली जब यह एक प्रमुख बौद्ध केंद्र के रूप में विकसित हो गया था। तब इसका नाम साकेत था, जो अयोध्या राम जन्म भूमि का एक पौराणिक नाम भी है।

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चीनी भिक्षु फा-हियान ने भी यहां कई बौद्ध मठों के होने का वर्णन किया है। यहां पर 7वीं शताब्दी में चीनी यात्री हेनत्सांग भी आया था। उसके अनुसार यहां पर 20 बौद्ध मंदिर उपस्थित थे जहाँ 3,000 भिक्षु रहते थे और यहां पर हिन्दुओं का एक प्रमुख और अति भव्य मंदिर श्री राम जन्म भूमि मंदिर भी था, जहां पर रोज हजारों की संख्या में लोग दर्शन करने के लिये आते थे।

इसके बाद प्राप्त साक्ष्यो के अनुसार ईसा की 11वीं शताब्दी में कन्नौज के राजा नरेश जयचंद का शासन आया तो उसने मंदिर पर से सम्राट विक्रमादित्य के प्रशस्ति शिलालेखो को उखाड़कर उन पर अपना नाम लिखवा दिया था। पानीपत के युद्ध के बाद जयचंद का भी अंत हो गया।

अयोध्या राम जन्म भूमि पर विदेशी आक्रमण 

इसके बाद भारतवर्ष पर विदेशी आक्रांताओं का आक्रमण बढ़ गया। इन आक्रमणकारियों ने काशी, मथुरा के साथ ही अयोध्या में भी लूटपाट की और पुजारियों की हत्या कर मूर्तियां को तोड़ने का क्रम जारी रखा। लेकिन 14वीं सदी तक वे अयोध्या में श्री राम जन्म भूमि मंदिर को तोड़ने में किसी भी प्रकार सफल नहीं हो पाए।

ऐसे कई आक्रमणों और झंझावातों को झेलने के बाद भी अयोध्या में बना भगवान श्रीराम जन्मभूमि भव्य मंदिर 14वीं शताब्दी तक किसी प्रकार बचा रहा। इतिहसकारों द्वारा यह भी उल्लेख किया जाता है कि सिकंदर लोदी के शासनकाल तक अयोध्या राम जन्म भूमि मंदिर मौजूद था। 

लेकिन 14वीं शताब्दी में हिन्दुस्तान पर मुगलों का अधिकार हो गया और उसके बाद ही अयोध्या श्री राम जन्मभूमि मंदिर एवं अयोध्या नगरी को नष्ट करने के लिए कई अभियान चलाए गए और अंतत: 1527-28 में इस भव्य राम जन्म भूमि मंदिर को तोड़ दिया गया और उसकी जगह एक बाबरी ढांचा खड़ा कर दिया गया था। 

मुगल साम्राज्य के संस्थापक बाबर के एक सेनापति ने अपने बिहार अभियान के समय अयोध्या में श्रीराम जन्म भूमि पर स्थित प्राचीन एवं भव्य श्री राम मंदिर को तोड़कर एक मस्जिद बनवाई थी, जो 1992 तक विद्यमान रही। बाबरनामा के अनुसार 1528 में अपने अयोध्या पड़ाव के दौरान बाबर ने राम जन्म भूमि मंदिर के स्थान पर मस्जिद निर्माण का आदेश दिया था। 

अयोध्या में बनाई गई मस्जिद में खुदे दो संदेशों से इसका स्पष्ट संकेत भी मिलता है। इसमें एक संदेश खासतौर से उल्लेखनीय है। जिसका सार यह है, 'जन्नत तक जिसके न्याय के चर्चे हैं, ऐसे महान शासक बाबर के आदेश पर दयालु मीर बकी ने फरिश्तों की इस जगह को मुकम्मल रूप दिया।

हालांकि इसका भी जिक्र मिलता है कि अकबर और जहांगीर के शासनकाल में हिन्दुओं को यह भूमि एक चबूतरे के रूप में सौंप दी गई थी लेकिन क्रूर शासक औरंगजेब ने अपने पूर्वज बाबर के सपने को पूरा करते हुए यहां एक भव्य मस्जिद का निर्माण कर उसका नाम बाबरी मस्जिद रख दिया था।

गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा दिया गया अयोध्या राम जन्म भूमि का ऐतिहासिक प्रमाण  

यहाँ पर एक भव्य राम मंदिर था इसका एक बहुत 'मज़बूत प्रमाण' है - गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित वे आठ दोहे जिनमें उन्होंने साफ़-साफ़ कहा है कि मीर बाक़ी ने यह मंदिर तोड़ा और मसजिद बनाई।

मंत्र उपनिषद ब्राह्मनहुँ बहु पुरान इतिहास। जवन जराये रोष भरि, करि तुलसी परिहास॥

सिखा सूत्र से हीन करि, बल ते हिन्दू लोग। भमरि भगाये देश ते, तुलसी कठिन कुजोग॥ 

बाबर बर्बर आइके, कर लीन्हे करवाल। हने पचारि-पचारि जन, तुलसी काल कराल॥

सम्बत सर वसु बान नभ, ग्रीष्म ऋतु अनुमानि। तुलसी अवधहिं जड़ जवन, अनरथ किए अनखानि॥

राम जनम महिं मंदिरहिं, तोरि मसीत बनाय। जवहि बहु हिन्दुन हते, तुलसी कीन्ही हाय॥

दल्यो मीरबाकी अवध, मन्दिर रामसमाज। तुलसी रोवत हृदय हति, त्राहि-त्राहि रघुराज॥

राम जनम मंदिर जहाँ, लसत अवध के बीच। तुलसी रची मसीत तहँ, मीरबाकी खल नीच॥

रामायन घरि घन्ट जहँ, श्रुति पुरान उपखान। तुलसी जवन अजान तहँ, कियो कुरान अजान॥

अयोध्या राम जन्म भूमि का पौराणिक इतिहास

इसके बाद समय समय पर इस स्थान पर पुनः मंदिर निर्माण के लिये आंदोलन चलते रहे।

अयोध्या राम जन्म भूमि मंदिर आंदोलन की शुरवात कैसे हुई?   

वर्ष 1989 में विश्व हिन्दू परिषद द्वारा अयोध्या में विवादित स्थल के पास राम मंदिर निर्माण के लिये किये गये शिलान्यास से भाजपा और हिंदू संगठनों का उत्साह अपने चरम पर पहुंच गया। इस उत्साह को भुनाने के लिए सितंबर 1990 में भाजपा के तत्कालीन अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी ने श्रीराम रथ यात्रा का आयोजन किया। 

इस आइडिया को भाजपा के दिवंगत नेता प्रमोद महाजन ने दिया था। इसका मकसद देशभर में लोगों को अयोध्या राम जन्म भूमि मूवमेंट के बारे में जागरूक करना और एक साथ जोड़ना था। इस रथ यात्रा को लोगों का जबरदस्त समर्थन मिला। इसके बाद श्री राम मंदिर निर्माण के लिए पूरे देश में एक ऐसी लहर उठी जिसने दो वर्ष बाद 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में स्थित विवादित ढांचा (बाबरी मस्जिद) को गिरा दिया गया।

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इसके बाद से यह विवाद सर्वोच्च अदालत में चलता रहा जिस पर अदालत के निर्णय के बाद अयोध्या राम जन्म भूमि स्थान हिन्दुओ को मंदिर निर्माण के लिये सौप दिया गया। हिन्दू समाज की बरसो पुरानी अभिलाषा अब पूरी होने जा रही है जिसके लिये ना जाने कितने लोगो ने अपना बलिदान दे दिया।

ये हमारी खुशकिस्मती है की हमे अपने जीवन काल में भव्य अयोध्या श्री राम जन्म भूमि मंदिर के दर्शन होने जा रहे है। इसके लिये सभी सनातन प्रेमी ईश्वर का तहे दिल से धन्यवाद और उन सभी लोगो का आभार प्रगट करते है, जिन्होंने अयोध्या राम जन्म भूमि मुक्ति अभियान के लिये अपने प्राणों तक का बलिदान दे दिया।

अयोध्या राम जन्म भूमि मुक्ति अभियान में बलिदान देने वालो की सूचि  

चलिए जानते हैं राम मंदिर के उन सभी चेहरों को, जिनके प्रयास के बिना राम मंदिर का सपना अधूरा था।

  • महंत रघुबर दास
  • गोपाल सिंह विशारद
  • के.के. नायर
  • महंत दिग्विजय नाथ
  • सुरेश बघेल
  • अशोक सिंघल
  • प्रवीण तोगड़िया
  • लालकृष्ण आडवाणी 
  • मुरली मनोहर जोशी
  • विनय कटियार
  • कल्याण सिंह
  • उमा भारती 
  • साध्वी ऋतंभरा
अयोध्या राम जन्म भूमि का पौराणिक इतिहास

अयोध्या में बनने वाले श्री राम जन्म भूमि मंदिर की विशेषता

1. यह मंदिर 67.7 एकड़ भूमि पर इसका निर्माण किया जा रहा है 

2. इस मंदिर के निर्माण में 4 लाख घन मीटर पत्थर लगेगा 

3. इस मंदिर की लम्बाई 360 फीट होगी 

4. इस मंदिर की चौड़ाई 235 फीट होगी 

5. इसकी ऊचाई 168 फीट होगी 

6. रामलला का मंदिर 3 मंजिल का होगा 

7. 45 एकड़ भूमि में रामकथा कुंज का निर्माण किया जायेगा 

8. इस मंदिर में 5 गुम्बद होंगे 

9. भगवान राम का दरबार पहले फ्लोर पर होगा 

10. यह मंदिर 318 खम्बो पर खड़ा होगा 

11. एक खम्बे की उचाई 14.6 फीट होगी 

12. प्रत्येक खम्बे पर 16 मूर्तियों को तराशा जायेगा 

13. इस मंदिर के निर्माण में 3 साल और 6 माह का समय लगेगा 

14. इस मंदिर का निर्माण नागर शैली के अनुसार किया जायेगा 

15. इस मंदिर के आर्किटेक्ट चंद्रकांत भाई सोमपुरा है 

16. कंस्ट्रक्शन कंपनी एलएंडटी इसका निर्माण कार्य करेगी 

अंत में निष्कर्ष
 

आज अयोध्या में श्री राम मंदिर के निर्माण को लेकर 492 साल का लंबा इंतजार खत्म हो गया है। अयोध्या में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा निर्धारित मुहूर्त में भूमि पूजन के साथ मंदिर के निर्माण की आधारशिला का भी पूजन किया गया। आज अगर हम श्री राम मंदिर के निर्माण का अपना सपना पूरा होता हुऐ देख रहे है, तो इसके पीछे कई लोगों का बहुत बड़ा योगदान है।

कई वर्षों से अयोध्या में भव्य श्री राम मंदिर के लिए हुए आंदोलन ने कई प्रमुख चेहरों को समय-समय पर अभियान को आगे बढ़ाते हुऐ देखा है। राम मंदिर के इस आंदोलन से जुड़े कुछ चेहरों को जहां प्रसिद्धि और प्रचार मिला, परन्तु कुछ चेहरे ऐसे भी हैं जिनके नसीब में सिर्फ गुमनामी ही आई। आज हम उन सब चेहरों का अभिवादन करते है जिनके अथक प्रयासों से यह चिकालीन सपना पूर्ण हुआ।

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