मथुरा कृष्ण जन्मभूमि विवाद का पूरा सच क्या है जाने....

मथुरा कृष्ण जन्मभूमि हिन्दुओं का एक प्रमुख धार्मिक स्थान है, जिसे हिंदू धर्म के अनुयायी भगवान कृष्ण का जन्म स्थान मानते हैं। यह धर्म स्थान भी अयोध्या-काशी की तरह ही विवादों में उलझा हुआ है क्योंकि इससे सटी जामा मस्जिद मुस्लिमों का धार्मिक स्थल है। भगवान श्रीकृष्ण की जन्मस्थली मथुरा को विश्व स्तर पर भगवान श्रीकृष्ण की जन्मभूमि से ही जाना जाता है। आज जो वहाँ एक आकर्षक मंदिर स्थापित है वह महामना पंडित मदनमोहन मालवीय की प्रेरणा से ही स्थापित है। पर्यटन की दृष्टि से भी यहां प्रतिदिन देश-विदेश से हजारों श्रद्धालु भगवान कृष्ण के दर्शन के लिए आते हैं। 

मथुरा कृष्ण जन्मभूमि विवाद

मथुरा श्री कृष्ण जन्मभूमि का इतिहास

आज जिस जगह पर भगवान श्री कृष्‍ण का मंदिर है, वह आज से पांच हजार साल पहले मल्‍लपुरा क्षेत्र के कटरा केशव देव में मथुरा के राजा कंस का कारागार हुआ करता था। इसी कारागार में आधी रात को रोहिणी नक्षत्र में भगवान श्री कृष्‍ण ने जन्‍म लिया था। विख्यात इतिहासकार डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल ने भी कटरा केशवदेव स्थल को ही श्री कृष्ण जन्मभूमि माना है। विभिन्न अध्‍ययनों और प्रमाणित साक्ष्यों के आधार पर ही कृष्णदत्त वाजपेयी ने भी कटरा केशवदेव स्थल को ही असली कृष्ण जन्मभूमि माना है। जनमान्यता के अनुसार, इसी स्थल पर सबसे पहले भगवान कृष्ण के प्रपौत्र बज्रनाभ ने ही अपने कुलदेवता की स्मृति में एक भव्य कृष्ण मंदिर बनवाया था।

यहां से मिले शिलालेखों पर ब्राहम्मी-लिपि में लिखा हुआ है। जिससे यह पता चलता है कि शोडास के राज्य काल में वसु नामक व्यक्ति ने कृष्ण जन्मभूमि पर पहली बार तोरण द्वार के रूप में अर्जुनायन शासक अर्लिक वसु द्वारा कोई निर्माण किया गया था, लेकिन यहां पहला मंदिर यदुवंशी राजा बज्रनाभ द्वारा 80 साल ईसा पूर्व में बनाया गया था। जिसके बाद सम्राट चंद्रगुप्त विक्रमादित्य ने 400 ईस्वी में यहाँ दुबारा मंदिर का निर्माण कराया। लेकिन इस मंदिर को महमूद गजनवी ने सन 1017 ई. में आक्रमण कर इसे लूटने के बाद तोड़ दिया था। उसके बाद महाराजा विजयपाल देव तोमर के शासनकाल में हिंदू जाट शासक जजन सिंह ने यहाँ पुनः मंदिर का निर्माण कराया।

शासक जजन सिंह तोमर (कुंतल) ने इसे 1150 ई. में कृष्ण मंदिर निर्माण करवाया था। जजन सिंह को जन्ना और जज्ज़ नामों से भी सम्बोधित किया गया है। उनके वंशज आज जजन पट्टी, नगला झींगा, नगला कटालिया में रहते हैं। खुदाई में मिले एक संस्कृत शिलालेख से जजन सिंह के द्वारा मंदिर के निर्माण का भी पता चलता है। शिलालेख के अनुसार मंदिर के खर्च के लिए दो घर, छह दुकानें और एक बगीचा भी दान में दिया गया था, दिल्ली के राजा के परामर्श से, 14 व्यक्तियों का एक समूह बनाया गया, जिसकी अध्यक्षता जजन सिंह ने की थी।

उसके बाद इस मंदिर को भी 16वीं शताब्दी में सिकंदर लोधी ने तोड़ा था। 1618 ई. में, ओरछा के बुंदेला राजा वीर सिंह जुदेव ने जन्मभूमि पर 33 लाख रूपए में एक विशाल मंदिर का निर्माण किया, यह मंदिर इतना विशाल था कि यह आगरा से दिखाई देता था। इस मंदिर को फिर 1670 में मुगल शासक औरंगजेब ने नष्ट कर दिया था और इसकी मुर्तिया, भवन सामग्री को आगरा की जैनारा मस्जिद की सीढ़ियों के निचे दबवा दिया था ताकि जब लोग नमाज पढ़ने जाये तो वो इन मूर्तियों को कुचलते हुऐ जाये। इस मंदिर को तोड़ने का औरंगजेब के फरमान की ओरिजनल कॉपी बीकानेर के म्यूजियम में रखी हुई है। इस मंदिर को बचाने के लिए गौकुला जाटों ने मुगलो से युद्ध किया था और उनके बलिदान के बाद ही इसे तोड़ा जा सका था, उसके बाद जाटों ने मुगलों की राजधानी आगरा पर हमला कर दिया। 

यहां प्राप्त अवशेषों से यह पता चलता है यहाँ मौजूद मंदि‍र के चारों ओर एक ऊंची दीवार का परकोटा था और मंदिर के दक्षिण पश्चिम कोने में एक कुआं का निर्माण भी किया गया था, जहाँ से पानी को 60 फीट की ऊंचाई तक ले जाकर मंदि‍र के प्रांगण में बने हुऐ फव्‍वारे को चलाया जाता था। आज भी इस स्थान पर उस कुएं और बुर्ज के अवशेष अभी तक मौजूद है।

इसके बाद 5 अप्रैल 1770 को वहाँ पर मराठा आये और उन्होंने यहाँ से मुसलमानो को खदेड़कर यहाँ की सारी सम्पत्ति अपने कब्जे में ले ली। वर्ष 1815 में ब्रिटिश शासन के दौरान नीलामी में बनारस के राजा पटनीमल ने इस जगह (13.7 एकड़) को खरीद लिया था। 1940 में जब पंडित मदन मोहन मालवीय यहां आए तो श्रीकृष्ण की जन्मभूमि की दुर्दशा देखकर उन्हें बहुत निराशा हुई। तीन साल बाद 1943 में उद्योगपति जुगलकिशोर बिड़ला मथुरा आए और उन्हें भी श्रीकृष्ण जन्मभूमि की दुर्दशा देखकर दुख हुआ। इसी बीच मालवीय जी ने श्री कृष्ण जन्मभूमि के पुनरुद्धार के संबंध में बिड़ला को एक पत्र लिखा।

मदन मोहन मालवीय की इच्छा का सम्मान करते हुए 8 फरवरी 1944 को राजा पटनीमल के उत्तराधिकारियों राय किशनदास जी ने यह सम्पत्ति मदन मोहन मालवीय जी को 13,400 रूपए में बेचीं और यह पैसा जुगलकिशोर बिड़ला जी ने दिया। इससे पहले ही मालवीय जी कुछ कर पाते उनका देहांत हो गया। उनकी अंतिम इच्छा के अनुसार, बिड़ला ने 21 फरवरी 1951 को श्री कृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट की स्थापना की। ट्रस्ट की स्थापना से पहले यहां रहने वाले कुछ मुसलमानों ने 1945 में इलाहाबाद हाई कोर्ट में एक रिट दायर की थी। इसका फैसला 1953 में आया था। इसके बाद ही यहां कुछ निर्माण कार्य शुरू हो सका। यहां गर्भगृह और भव्य भागवत भवन का जीर्णोद्धार व निर्माण कार्य शुरू हुआ, जो फरवरी 1982 में बनकर तैयार हुआ।

श्री कृष्ण जन्मभूमि विवाद पर अब तक का अपडेट 

श्री कृष्ण जन्मभूमि विवाद मामले में दायर मुकदमे में कहा गया है कि 1 मई 1958 को श्री कृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट वर्चुवली डिफंक्शन हो गया और इसे एक फेक संस्था श्री कृष्ण जन्मस्थान सेवा संघ के नाम से इस पर अधिकार कर लिया गया था। उसके बाद 1964 को श्री कृष्ण जनस्थान सेवा संघ ने एक मुकदमा दर्ज किया की घोषी मुस्लिम समाज के लोगो ने यहाँ कब्ज़ा कर लिया और अवैध मस्जिद का निर्माण कर रहे है जिसे तुरंत हटाया जाना चाहिये।

इसके बाद उस समय की कांग्रेसी सरकार के दबाव में 12 अक्टूबर 1968 को श्री कृष्ण जन्मस्थान सेवा संघ और शाही मस्जिद ईदगाह के प्रतिनिधियो के बीच एक समझौता किया गया था। जिसे 17 अक्टूबर 1968 को पेश किया गया था और इसे 22 नवंबर 1968 को मथुरा के सब रजिस्ट्रार के साथ पंजीकृत किया गया था।

अदालत में दायर याचिका में कहा गया है कि कटरा केशव देव की पूरी संपत्ति श्री कृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट की है जो अब एक्टिव है और इसका स्वामित्व श्री कृष्ण जन्मस्थान सेवा संस्थान को नहीं दिया जा सकता है। यह संसथान अवैध है उनके द्वारा किया गया उक्त समझौता भी अवैध है, वहां कटरा केशव देव की संपत्ति पर शाही मस्जिद ईदगाह का कोई अधिकार नहीं हो सकता, इसलिए उस पर किया गया निर्माण भी अवैध है। इसी आधार पर शाही मस्जिद ईदगाह को हटाने की बात कही गई है।

श्री कृष्ण विराजमान वाद 25 सितंबर 2020 को मथुरा कोर्ट में दायर किया गया था। सुनवाई के बाद 30 सितंबर को वाद खारिज कर दिया गया। श्री कृष्ण विराजमान मामले में 12 अक्टूबर को जिला न्यायाधीश की अदालत में अपील दायर की गई थी। जिला जज की अदालत ने इसे स्वीकार करते हुए चारों प्रतिवादियों को नोटिस जारी किया, श्री कृष्ण जन्मस्थान सेवा संस्थान, श्री कृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट, शाही मस्जिद ईदगाह कमेटी और उत्तर प्रदेश सुन्नी सेंट्रल बोर्ड को नोटिस जारी किया गया है।

वादी के वरिष्ठ अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने मथुरा श्रीकृष्ण जन्मभूमि मामले में जानकारी देते हुए बताया कि अब तक पांच मुकदमे दर्ज हो चुके हैं। कटरा केशवदेव मंदिर की 13.7 एकड़ जमीन के एक हिस्से में बनी शाही मस्जिद ईदगाह को हटाने के संबंध में सिविल जज सीनियर डिवीजन नेहा बनौदिया की अदालत में दो मुकदमे दर्ज हो चुके हैं। अब तक कुल पांच मुकदमे दायर किए जा चुके हैं।

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